सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षाविदों को ब्लैकलिस्ट करने का आदेश वापस लिया
सुप्रीम कोर्ट ने एनसीआरटी की कक्षा आठ की सामाजिक विज्ञान पुस्तक में न्यायपालिका पर विवादित पाठ तैयार करने वाले तीन शिक्षाविदों — प्रोफेसर मिशेल डैनिनो, सुवर्णा दिवाकर और आलोक प्रसन्ना कुमार — को ब्लैकलिस्ट करने संबंधी 11 मार्च के अपने आदेश को वापस ले लिया है।
22 मई को कोर्ट ने तीनों शिक्षाविदों की अर्जियों पर सुनवाई के बाद अपने पूर्व आदेश के उस हिस्से में संशोधन किया, जिसमें केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को इन शिक्षाविदों से शैक्षणिक संबंध समाप्त करने के निर्देश दिए गए थे।
यह आदेश प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बाग्ची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने दिया। पीठ ने 11 मार्च के आदेश के उस हिस्से को भी वापस ले लिया, जिसमें कहा गया था कि इन शिक्षाविदों ने जानबूझकर तथ्यों को गलत तरीके से प्रस्तुत कर कक्षा आठ के छात्रों के सामने भारतीय न्यायपालिका की नकारात्मक छवि पेश की।
पूर्व आदेश में किया गया संशोधन
23 मई को शीर्ष अदालत ने अपने पूर्व आदेश में संशोधन करते हुए कहा कि आवेदकों द्वारा दी गई सफाई को देखते हुए केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, केंद्र शासित प्रदेशों, विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों को इन शिक्षाविदों से संबंध समाप्त करने के निर्देश वापस लेना उचित है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार, राज्य सरकारें, केंद्र शासित प्रदेश, सरकारी विश्वविद्यालय और अन्य शैक्षणिक संस्थान स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं और वे 11 मार्च के आदेश में की गई टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना फैसला ले सकते हैं।
पाठ तैयार करना सामूहिक प्रक्रिया : शिक्षाविद
सुनवाई के दौरान शिक्षाविदों की ओर से दलील दी गई कि पाठ्यपुस्तक का मसौदा तैयार करना किसी एक व्यक्ति का कार्य नहीं होता, बल्कि यह एक सामूहिक शैक्षणिक प्रक्रिया होती है। इस पर कोर्ट ने कहा कि उसकी पूर्व टिप्पणी सामग्री के संबंध में थी, न कि किसी विशेष व्यक्ति के खिलाफ।
हालांकि, सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार इन तीनों शिक्षाविदों के साथ किसी प्रकार का संबंध नहीं रखेगी।



