मतदान को अनिवार्य बनाने में कानूनी पेच: सुप्रीम कोर्ट का रुख
सुप्रीम कोर्ट ने देश में मतदान को अनिवार्य बनाने के लिए दिशा-निर्देश देने की मांग वाली एक जनहित याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि इस मांग को स्वीकार किया गया तो न्यायाधीशों और नागरिकों को अपने जरूरी कार्य छोड़कर मतदान करना पड़ेगा।
कोर्ट की टिप्पणियाँ
न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की पीठ ने 16 अप्रैल को कहा कि यह मामला “नीति क्षेत्र” से संबंधित है और इसे न्यायपालिका द्वारा नहीं देखा जा सकता।
कोर्ट ने अनिवार्य मतदान लागू करने में व्यावहारिक कठिनाइयों का उल्लेख किया और कहा कि चुनाव के दिन कई लोग, जैसे जज और मजदूर, अपने आवश्यक कार्यों में व्यस्त होते हैं।
मुख्य न्यायाधीश ने सवाल किया कि यदि कोई गरीब व्यक्ति कहे कि उसे रोज़ी-रोटी कमानी है, तो उसे मतदान के लिए कैसे बाध्य किया जा सकता है।
याचिकाकर्ता ने सुझाव दिया कि चुनाव आयोग को एक समिति बनानी चाहिए जो मतदान न करने वालों पर प्रतिबंध और दंड पर विचार करे।
हालांकि कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे विषय नीति निर्माण के अंतर्गत आते हैं, और न्यायालय इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
मुख्य न्यायाधीश का बयान
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि लोकतंत्र जागरूकता पर आधारित है, न कि कानूनी दबाव पर। उन्होंने कहा कि मतदान करना अपेक्षित है, लेकिन इसे बाध्य नहीं किया जा सकता।
उन्होंने यह भी कहा कि जिम्मेदारी जागरूकता बढ़ाने की है, न कि लोगों को मजबूर करने की, क्योंकि लोकतंत्र में स्वतंत्रता सबसे महत्वपूर्ण है।