उल्लुओं की गिनती करने वाला पहला राज्य बना पश्चिम बंगाल
भारत में पहली बार उल्लुओं की गिनती की जाएगी, जिसकी शुरुआत अगले महीने से पश्चिम बंगाल में होने जा रही है। इस सर्वे का नेतृत्व बर्ड्स वाचर्स सोसायटी कर रही है, जबकि WWF-इंडिया और राज्य वन विभाग इसमें सहयोग प्रदान कर रहे हैं।
इस पहल का उद्देश्य राज्य में मौजूद 23 उल्लू प्रजातियों की पहचान करना और यह समझना है कि वे किन क्षेत्रों में और किन परिस्थितियों में रह रहे हैं। इस पहल के साथ पश्चिम बंगाल भारत का पहला राज्य बन जाएगा, जहां उल्लुओं की आधिकारिक गणना की जा रही है।
यह सर्वे अगले महीने से शुरू होकर मई तक चलेगा। इसके माध्यम से उल्लुओं के आवास और उनकी स्थिति से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां एकत्र की जाएंगी, जिससे उनके संरक्षण के लिए प्रभावी रणनीति बनाई जा सके।
भारत में उल्लुओं की कुल प्रजातियां
भारत में उल्लुओं की कुल 36 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिनमें से 23 प्रजातियां अकेले पश्चिम बंगाल में मौजूद हैं। ये उल्लू उत्तर में हिमालय के ऊंचे क्षेत्रों से लेकर दक्षिण में सुंदरबन तक फैले हुए हैं।
इस सर्वे के दौरान विशेष रूप से तीन प्रमुख उल्लू प्रजातियों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा:
- ब्राउन फिश आउल – आकार में बड़ा उल्लू, जिसकी पहचान कान की कलगी, चमकीली पीली आंखों और भूरे-धारीदार पंखों से होती है। यह मछलियों और छोटे जलीय जीवों का शिकार करता है।
- ओरिएंटल बे आउल – आकार में छोटा उल्लू, जिसके सिर पर छोटे पंखों के गुच्छे, पीली आंखें और धूसर-भूरे रंग के पंख होते हैं।
- यूरेशियन स्कॉप्स आउल – यह भी छोटा उल्लू होता है, जिसके पंख पेड़ों की छाल के रंग से मेल खाते हैं और यह आसानी से छिप जाता है।
सर्वे के पीछे का उद्देश्य
फरक्का क्षेत्र में दुर्लभ ऑस्ट्रेलियन ग्रास उल्लू के मिलने के बाद इस सर्वे की आवश्यकता और अधिक महसूस की गई। इस अध्ययन का उद्देश्य केवल प्रजातियों की पहचान नहीं, बल्कि यह समझना भी है कि तेजी से हो रहा शहरीकरण और जंगलों की कटाई उल्लुओं के प्राकृतिक आवास को कैसे प्रभावित कर रही है।
शहरों का विस्तार, पेड़ों की कमी, रोशनी और शोर प्रदूषण के कारण कई उल्लू प्रजातियां अपने प्राकृतिक घरों से बेघर होती जा रही हैं। यह सर्वे भविष्य में उल्लुओं के संरक्षण के लिए नीतियां बनाने में अहम भूमिका निभाएगा।